सुबह धुंदली-धुंदली थी,
सीढ़ी में माँ डगमगाई थी,
ट्रेन भी दौड़ के पकड़ी थी,
कुछ हाथ से छूटा-छूटा लगा था,
दिन भी डूबा-डूबा था,
चाँद भी अधूरा था।
धत,,,,,,,,,,
सुबह सूरज ठंडक लिए था,
सीढ़ी पे माँ डगमगा के संभली थी,
ट्रेन भी टाइम पे पकड़ी थी,
छूटते-छूटते दोबारा पाया था,
दिन भी खिल उठा था,
अर्ध चाँद भी मुस्कुरा उठा था।
सीढ़ी में माँ डगमगाई थी,
ट्रेन भी दौड़ के पकड़ी थी,
कुछ हाथ से छूटा-छूटा लगा था,
दिन भी डूबा-डूबा था,
चाँद भी अधूरा था।
धत,,,,,,,,,,
सुबह सूरज ठंडक लिए था,
सीढ़ी पे माँ डगमगा के संभली थी,
ट्रेन भी टाइम पे पकड़ी थी,
छूटते-छूटते दोबारा पाया था,
दिन भी खिल उठा था,
अर्ध चाँद भी मुस्कुरा उठा था।
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