रविवार, 4 नवंबर 2012

jijivisha: वो दिन,,,,,

jijivisha: वो दिन,,,,,: सुबह धुंदली-धुंदली थी, सीढ़ी में माँ डगमगाई थी, ट्रेन भी दौड़ के पकड़ी थी, कुछ हाथ से छूटा-छूटा लगा था, दिन भी डूबा-डूबा था, चाँद भी अधूर...

वो दिन,,,,,

सुबह धुंदली-धुंदली थी,
सीढ़ी में माँ डगमगाई थी,
ट्रेन भी दौड़ के पकड़ी थी,
कुछ हाथ से छूटा-छूटा लगा था,
दिन भी डूबा-डूबा था,
चाँद भी अधूरा था।

धत,,,,,,,,,,
सुबह सूरज ठंडक लिए था,
सीढ़ी पे माँ डगमगा के संभली थी,
ट्रेन भी टाइम पे पकड़ी थी,
छूटते-छूटते दोबारा पाया था,
दिन भी खिल उठा था,
अर्ध चाँद भी मुस्कुरा उठा था।