रविवार, 10 अप्रैल 2011
jijivisha: मौन निमंत्रण
jijivisha: मौन निमंत्रण: "मौन निमंत्रण से उस बदल के, पहुच गयी मै निकट उसके, बनाया था आकर्षक आसन उसने, विराज गयी आसन में, मै उसके। कुछ- निराश और आशाएं लिए, ..."
jijivisha: फूल और पथिक
jijivisha: फूल और पथिक: "तन्हा उस कंकरीट की, दरार से उगता हुआ वो पौधा, खिला था जिसमे, खिलखिलाता वो फूल। पढ़ी थी नज़र उसमे तुम्हारी कोमल, आश्चर्यचकित, रोमांचित हो, पूछ..."
फूल और पथिक
तन्हा उस कंकरीट की,
दरार से उगता हुआ
वो पौधा,
खिला था जिसमे,
खिलखिलाता वो फूल।
पढ़ी थी नज़र उसमे
तुम्हारी कोमल,
आश्चर्यचकित, रोमांचित हो,
पूछा तुमने उस पौधे से,
कौन हो तुम?
तो सुनो ऐ पथिक-
बोला वो फूल,
"मै हू वो,
जड़े जिसकी हें, गर्भ मै गहरी,
हवा के थपेड़े, गर्मी के लपेड़े,
कड़कती बिजली, वृष्टि घनघोर,
कर देते जिसे, खिलने को मजबूर।"
दरार से उगता हुआ
वो पौधा,
खिला था जिसमे,
खिलखिलाता वो फूल।
पढ़ी थी नज़र उसमे
तुम्हारी कोमल,
आश्चर्यचकित, रोमांचित हो,
पूछा तुमने उस पौधे से,
कौन हो तुम?
तो सुनो ऐ पथिक-
बोला वो फूल,
"मै हू वो,
जड़े जिसकी हें, गर्भ मै गहरी,
हवा के थपेड़े, गर्मी के लपेड़े,
कड़कती बिजली, वृष्टि घनघोर,
कर देते जिसे, खिलने को मजबूर।"
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